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अमरकांत का कथा साहित्य : कथ्य और शिल्प- डाॅ. शिवनारायण सिंह

  अमरकांत के कथा साहित्य पर अनेक शोध हुए हैं, किन्तु उनके सम्पूर्ण कथा साहित्य को समाहित करने वाला यह पहला शोध ग्रंथ है। साहित्य के अध्येताओं के लिए यह ग्रंथ अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। यद्यपि शीघ्रता के कारण इसमें  टाइपिंग की त्रुटियाँ मिल सकती हैं।   Chapter1-  https://drive.google.com/file/d/1zmkKcAijPW2eJ1Gf_tc82jJfjE8rDtHj/view?usp=drivesdk Chapter2    https://drive.google.com/file/d/1zoDyCbcWHtcktGRhPe7XPmc_HT5KIZg3/view?usp=drivesdk Chapter 3 https://drive.google.com/file/d/1zuDxuol6DMI41179VHx-jkhX9oUNZPw0/view?usp=drivesdk Chapter 4 https://drive.google.com/file/d/1zyYRQHK7lTQrF4u4p_DAGKgxkR3wkPKZ/view?usp=drivesdk Chapter 5 https://drive.google.com/file/d/1w1sDK8flooUWmbxT7vonSEVlAmQ83Ery/view?usp=drivesdk Chapter 6 https://drive.google.com/file/d/1-1ZJAZ34GCREme--yEMgdxdSA9WvhpLM/view?usp=drivesdk  संदर्भ ग्रंथ सूची  Amarkant ka katha sahitya : Kathya aur shilp   

हँसते रहना मुस्कुराते रहना - कुछ कविताएँ

                1  अगर लड़ते हो दौलत के लिए  तो कसम है खुदा की तुम्हें, मरना तो जमीं भी लेकर जाना ऐ राम के पुछल्लों! लानत है तुम्हे, लानत है तुम्हे।                2  हँसते रहना मुस्कुराते रहना खिलते रहन कमल की तरह, मेरी हर धड़कन हर साँसों में तुम होठों पे आना गजल की तरह।                 3 कद बड़ा है न पद बड़ा है, खुद से निगाह मिला सको- वह पथ बड़ा है। 

सारी हदें पार कर

 सारी हदें पार कर सारी हदें पार कर सरहदों के पार से, गोलियाँ चलाकर कहता है हमें प्यार दे।  सिखा नहीं है जिसने मानव की तरह रहना, सिखा रहा वो हमको अपनी हदों में रहना । संक्रमित नज़र है शैतान का असर है, दिल नहीं है जिनके, दिमाग में जहर है। अमन के रास्तों में काँटे बिछा-बिछाकर, जहर हैं परोसते मिश्री मिला-मिलाकर। खुदा का दिल दुखाकर खुदाई चाहते हैं, मिर्ची खिलाकर हमको, मिठाई चाहते हैं। ऐ मुर्दों! कहीं से दिल खरीद लो, प्रीत और झनकार की हिन्दुस्तानियों से सीख लो। तब अपने दिल के तार को, तुम्हारे दिल से हम मिलाएँगे; तुमसे मुहब्बत का इतिहास हम रचाएँगे।                            -डाॅ शिवनारायण सिंह 

लहरें उपन्यास अमरकांत

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  लहरें अमरकांत कृत 88 पृष्ठों का एक लघु उपन्यास है। इसे अमरकृतित्व प्रकाशन इलाहाबाद द्वारा सन् 2008 में प्रकाशित किया गया। इसमें एक अनपढ़, परित्यक्त स्त्री की व्यथा-कथा कही गई है , जो स्त्री के लिए लूला- लँगड़ा अथवा किसी भी प्रकार के पति का होना आवश्यक मानती है। मिलनी नामक सामाजिक संगठन कथा नायिका बच्ची देवी की मदद करती है, जिससे वह जागरूक बनती है।